सुदामा पांडेय 'धूमिल'

सुदामा पांडेय 'धूमिल'

Tuesday, November 8, 2011

सन्नाटे में कवि धूमिल की खेवली
हिन्दी कविता को अपनी धार देकर उसके समूचे कालखंड को इतिहास के पन्नों पर काबिज कराने वाले कवि धूमिल को पिछले कई वर्षो से उनके जन्म दिन(9 नवम्बर ) पर उनका गांव खेवली उनकी स्मृतियां सजोते हुए उन्हें अपनी सुमनांजलियां अर्पित करता है। ऐसा इस लिए भी कि धूमिल अपनी कविताओं के जरिए आकाश की बुलंदियां छूते हुए भी अपनी माटी का दर्द नहीं भूलते। अपने खेवली को नहीं भूलते। उन्हें संसद के साथ अपने खेतों की मेंड़, हदबंदी, नीम का पेड़, कौए की कर्कश आवाज, तीरथ पर निकली मां का चेहरा, बेटी की आंखें और जवान बछड़े की मौत भी याद रहती है। आजादी के बाद की कविता में देश, लोकतंत्र और आम आदमी की पीड़ा को संसद के गलियारों तक मुखर करने वाले धूमिल ने भुखमरी, महंगाई और बेरोजगारी पर किसी भविष्यद्रष्टा की तरह कलम चलाई। बारीकी से देखें तो धूमिल की कल की पंक्तियां आज का सच उकेरती मिलती हैं। संसद से सड़क तक लिखकर देश के सियासी माहौल में भूचाल मचा देने वाले कवि धूमिल के गांव में बरबस सी खामोशी है। छठे छमासे, या फिर उनकी सालगिरह पर गांव का सन्नाटा टूटता है। पूरे देश में धूमिल की पंक्तियों का इस्तेमाल करने वाले राजनीति के सूरमाओं या फिर सरकार को भी कभी खेवली की याद नहीं आती। खेवली में धूमिल का मकान जहां लालटेन की रोशनी में वे अपनी कविताओं के लिए शब्द रोपा करते वह घर जमींदोज हो चुका है। एक ऐसा घर जहां से धूमिल ने हिन्दी साहित्य का गागर भरा वह जीर्णशीर्ण और उपेक्षित दशा में पड़ा है। इस पर किसी की नजर नहीं है। साल में एकाध बार धूमिल को चाहने वाले खेवली पहुंचते हैं और उन्हें याद कर लौट आते हैं। कुछ समय सन्नाटे से बाहर रहने वाली खेवली फिर सन्नाटे में डूब जाती है। धूमिल का पूरा नाम सुदामा पांडेय था। उनकी पत्नी मूरत देवी आज भी खेवली में उनकी स्मृतियों के सहारे जिन्दगी का तनहां सफर काट रही हैं। उन्हें कुछ भी नहीं भूला। बढती उम्र के बावजूद उनके भीतर धूमिल से जुड़ी यादों का अमृत कोष भरा हुआ है। वे बताती हैं-उनके पति धूमिल रोज सुबह साइकिल से बनारस निकल जाते और देर शाम घर लौटते। किन्तु रात में सोने से पहले वे दिन भर का लेखा जोखा लेना नहीं भूलते। दिन भर क्या हुआ। कौन कहां गया। किस खेत की जुताई हुई और किस खेत में पानी पठाया गया। कितना बीज लगा, कितना चाहिए। घर में किसकी क्या जरूरत है और कितनी पूरी हुई। बकौल मूरत देवी धूमिल की यात्रा का प्रिय साधन साइकिल थी। साइकिल और कंधे पर झोला उसमें चंद कागज किताबें यही उनकी सम्पदा थी। एक बार वो बनारस से पैदल ही खेवली लौटे.उदास। बताया कि किसी ने शहर में उनकी साइकिल का ताला तोड़कर चुरा लिया। तब मैंने (मूरत देवी)उनसे कहा आप निराश न हों कल नई साइकिल ले लीजिएगा। मैने उनसे प्राप्त धन जो समय समय पर मुझे मिला करता उन्हें दे दिया। नई साइकिल से वे अगले दिन बनारस गए। उस दिन वह बहुत खुश थे। मूरत देवी के मुताबिक आर्थिक तंगी के कारण उन्हें कुछ समय कोलकाता में भी रहना पड़ा। बाद में आईटीआई में नौकरी कर ली। धूमिल के दो पुत्र हैं रत्नशंकर और आनंद शंकर। कवि धूमिल और उनकी पंक्तियां अब भी प्रासंगिक हैं तब, जब वे कहते हैं जनतंत्र की असली जंग के घर के जंग से शुरू होती है। या फिर एक आदमी रोटी बेलता है, दूसरा उसे खाता है। एक तीसरा आदमी भी है जो उसे न बेलता है न खाता है। मैं पूछता हूं वह तीसरा आदमी कौन है। मेरे देश की संसद मौन है। धूमिल अपनी कविताओं में दूसरे प्रजातंत्र तलाश करते। धूमिल की पंक्तियां-आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है.जिसे एक पहिया ढोता है।. या फिर न कोई प्रजा है न कोई तंत्र है यह आदमी का आदमी के खिलाफ षड़यंत्र है.। आज के दौर में भी बहुत कुछ सोचने को विवश करती हैं। -साथ में हरहुआ से कन्हैंया लाल पथिक।