सुदामा पांडेय 'धूमिल'

सुदामा पांडेय 'धूमिल'

Friday, February 9, 2018

धूमिल की अन्तिम कविता

आज धूमिल का पुण्यतिथि है. १० फरवरी १९७५ को किंग जॉर्ज हॉस्पिटल - लखनऊ में धूमिल ने हमेशा हमेशा के लिए साहित्य को अलविदा कह दिया. आज के दिन उनकी अंतिम कविता शेयर कर रहा हूँ. इस कविता को बिना कोई नाम दिए धूमिल चले गए और उनके चाहने वालो ने इस कविता को कभी "धूमिल की अन्तिम कविता" तो कभी "लोहे का स्वाद" जैसा शीर्षक दिया. बात फरवरी १९७५ के शुरूआती दिनों की है जब धूमिल ब्रेन कैंसर के असफल ऑपरेशन के बाद भयंकर पीड़ा से गुजर रहे थे.अपने छोटे भाई श्री कनैह्या पांडेय की इशारो से अपने पास बुलाया और अपनी अंतिम कविता उनसे लिखने को कहा. वो कहते थे "भाषा अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रही है। कुछ हैं जो भाषा को खा रहे हैं।" धूमिल ने भाषा को उसकी जिम्मेदारी की जगह तैनात किया. अंदाजा नहीं लगाया जा सकता की उस भयंकर पीड़ा में किसी को कविता कैसे सूझ सकती है लेकिन धूमिल का अंदाज ही कुछ ऐसा था. वो कहते थे " कविता भाष़ा में आदमी होने की तमीज है।" और साथ ही साथ "कविता घेराव में किसी बौखलाये हुये आदमी का संक्षिप्त एकालाप है।" आज पुण्यतिथि पे उनको नमन करते हुए उनकी अंतिम कविता आप सबके लिए -
शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज़ है या
मिट्टी में गिरे हुए ख़ून
का रंग।

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।


Wednesday, January 3, 2018

पटकथा (लम्बी रचना)

मुझे लगा कि एक विशाल दलदल के किनारे
बहुत बड़ा अधमरा पशु पड़ा हुआ है
उसकी नाभि में एक सड़ा हुआ घाव है
जिससे लगातार-भयानक बदबूदार मवाद
बह रहा है
उसमें जाति और धर्म और सम्प्रदाय और
पेशा और पूँजी के असंख्य कीड़े
किलबिला रहे हैं और अन्धकार में
डूबी हुई पृथ्वी
(पता नहीं किस अनहोनी की प्रतीक्षा में)
इस भीषण सड़ाँव को चुपचाप सह रही है
मगर आपस में नफरत करते हुये वे लोग
इस बात पर सहमत हैं कि
चुनावही सही इलाज है
क्योंकि बुरे और बुरे के बीच से
किसी हद तककम से कम बुरे कोचुनते हुये
उन्हें मलाल है, भय है
लाज है
दरअस्ल उन्हें एक मौका मिला है
और इसी बहाने
वे अपने पडो़सी को पराजित कर रहे हैं
मैंने देखा कि हर तरफ
मूढ़ता की हरी-हरी घास लहरा रही है
जिसे कुछ जंगली पशु
खूँद रहे हैं
लीद रहे हैं
चर रहे है
मैंने ऊब और गुस्से को
गलत मुहरों के नीचे से गुज़रते हुये देखा
मैंने अहिंसा को
एक सत्तारूढ़ शब्द का गला काटते हुये देखा
मैंने ईमानदारी को अपनी चोरजेबें
भरते हुये देखा
मैंने विवेक को
चापलूसों के तलवे चाटते हुये देखा

Monday, December 11, 2017

Saturday, December 2, 2017

रात्रि-भाषा

हाथों की भाषा
आँखों के संकेत
अच्छी तरह जानते हैं दोस्त !

दुश्मन की बेचैनी हर जगह
हथियार से टटोल रही है
यह है पेट
अंतडियाँ यहाँ हैं

भूख के आँसू ? इन्हें चलने दो ?
और यह रहा-- गुस्सा
हड़कम्प तेवर
आदमी होने की बान
इसे जाम करो ?