सुदामा पांडेय 'धूमिल'

सुदामा पांडेय 'धूमिल'

Wednesday, February 10, 2010

धूमिल और उनका संधर्ष

आज से ३५ साल पहले, यानि १० फरवरी १९७५, को हिंदी साहित्य का एक महान सूरज सदा के लिए अस्त हो गया।आज के ही दिन काल चक्र ने खेवली से उसके महान सपूत और हिंदी साहित्य के संघर्षशील और जोझारू कवी सुदामा पाण्डेय "धूमिल" को छीन लिया। ३५ साल पहले धूमिल ने अपने गाँव को जिस हल में छोड़ा था वो अब भी उसी तरह है। कुछ भी नहीं बदला। वहा आज भी तो जंगल है जनतंत्र / भाषा और गूंगेपन के बीच कोई दूरी नहीं है। वहा सब कुछ सदाचार की तरह सपाट और ईमानदारी की तरह असफल हैधूमिल खेवली के जेहन में एक योद्धा के रूप में उभरे। जब तक वे जिन्दा रहे, खेवली में उनका संधर्ष चलता रहा। उन्होंने खेवली में अपने को एक किसान सुदामा पाण्डेय के रूप में ही बनाये रखा। गुस्सैल, संघर्षशील और जोझारू सुदामा पाण्डेय के रूप में। धूमिल अपने कविता के माध्यम से एक क्रांति लाना चाहते थे और इसके लिए वो हमेशा संघर्ष करते रहे। जिस प्रकार कविता की रक्षा के लिए कबीर करघे पर कपड़ा बुनते थे, उसे बेचकर अपना खर्च चलते थे, संत रविदास कविता की रक्षा के लिए जूता बनाकर, उसे बेचकर अपना खर्च चलते थे, उसी प्रकार धूमिल ने सिर पर लोहा ढोकर अपना खर्च चलते थे। अपनी कविता की रक्षा कर रहे धूमिल का कर्म कबीर और रविदास से ज्यादा कठिनाइयों से भरा है।
"लोकतंत्र के
इस अमानवीय संकट के समय
कवितावों
के जरिये
मै भारतीय
वामपंथ
के चरित्र को
भ्रष्ट
होने से बचा सकूँगा "
एक
मात्र इसी विचार
से
मै रचना करता हूँ अन्यथा यह इतना दुस्साध्य
और कष्टप्रद है कि कोई भी व्यक्ति
अकेला
होकर मरना पसंद करेगा
बनिस्पत
इसमे आकर
एक
सार्वजनिक और क्रमिक मौत पाने के।

धूमिल ने अपनी जिंदगी अपने शर्तो और अपने हिसाब से जीया। वो कहते है कि "जिन्दगी को जीने के लिए किन - किन चीजों की जरूरत पड़ती है, रोटी कपड़ा और मकान। यह बहुत दिनों से चला रहा है, इसके आलावा भी बहुत कुछ है। लेकिन सबसे बड़ी चीज जो है वह मानसिक खुराक है। उस मानसिक खुराक की कमी के कारणकुण्ठा होतीहै। निराशा, हताशा और छटपटाहट होती है। ये जितने भी चालू शब्द है, सब उसी के विभिन्न रूप है। "
धूमिल कई मामलों में सबसे अलग थे। उनकी सोचने, उनकी बोलने और उनके लिखने का तरीका एकदम भिन्न था। वो अपने अधिकारों और उनकी सीमाओं से भली भात परिचित थे। लेकिन ज्याद पढ़ पाने का मलाल थाउन्हें, अपने डायरी में धूमिल ने जिक्र किया है - मैंने अपने यहाँ कि धांधली को बहुत गहरे जाकर महसूस किया है।मेरे जैसा आदमी, जो ईमानदारी तथा देश निष्ठा का एकतरफा दावा करता है, जब यहाँ होने वाली वैधानिक धांधलियों को देखकर भी चुप रह जाता है, तो अचानक कई तरह के सवाल मन में पैदा होते है। क्या यह मेरी कमजोरी है कि मै उन बेईमान लोगों का खुलकर विरोध नहीं कर पाता? आखिर यह क्यों है ? अपनी प्राथमिक योग्यताओं के प्रमाणपत्रों कि कमी मुझे इस वक्त बुरी तरह खलती है। इतनी कम योग्यता वाले आदमी को जो सुविधा यह सरकारी नौकरी दे रही है वह शायद और नहीं मिलेगी (जैसा कि बेकारी का दिन है ) और यही वजह हैकि मै बहार कर दिए जाने के भय से चुप रह जाना अच्छा समझता हूँ।
वे बड़े ही बेबाकी के साथ अपनी बात कह देते थे और फिर उन बातों को सुनकर ऐसा लगता है कि ये सब बातें कही कही एक आम आदमी की जिंदगी से जुड़ी बात है। हम जिन बातों को स्वीकार करने में हिचकिचाते है, डरते है, धूमिल ने उन सब बातों को स्वीकार। धूमिल ने भाषा, धर्म और संस्कृति जैसे शब्दों पर, उनके समसामयिकमुहावरों पर पूरी उत्तेजना से बात करते हुए शत प्रतिशत सुविधाभोगी लोगो को बड़े गहरे जाकर देखा था।
धूमिल जब अस्पताल में ब्रेन ट्यूमर से लड़ रहे थे तब उन्होंने अपनी अंतिम कविता लिखी। उस वक्त उनकी नजरएकदम कमजोर हो चुकी थी और सिर में भयंकर दर्द था। जिंदगी भर दूसरो कि लड़ाई लड़ता हुआ एक संघर्षशील और जोझारू कवी १० फरवरी १९७५ को अपने जिंदगी कि लड़ाई हार गया।

शब्द किस तरह / कविता बनते हैं
इसे
देखो
अक्षरों
के बीच गिरे हुए आदमी को पढो
क्या
तुमने सुना
कि
यह लोहे कि आवाज है या
मिट्टी
में गिरे हुए खून का रंग
लोहे
का स्वाद
लोहार
से मत पूछो
उस
घोड़े से पूछो
जिसके
मुंह में लगाम है।

ये धूमिल कि अंतिम कविता है।